बालाघाट में स्वास्थ्य विभाग का बड़ा मेडिकल रेस्क्यू: 980 घरों का सर्वे, सैकड़ों बच्चों का हुआ इलाज
बालाघाट के नक्सल प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य विभाग ने मोर्चा संभाल लिया है। कुपोषण और बीमारियों से बचाव के लिए बड़े स्तर पर मेडिकल कैंप और डोर-टू-डोर सर्वे किया जा रहा है।
नक्सलवाद के दौर में इलाज और शिक्षा से दूर रहे आदिवासी अब अस्पताल पहुंच रहे
सुरक्षा बलों के एक्शन से पस्त हुआ नक्सलवाद
मध्य प्रदेश के बालाघाट में सुरक्षा बलों और पुलिस की लगातार कार्रवाई ने नक्सलवाद की कमर तोड़ कर रख दी है। दशकों तक इस इलाके में दहशत का ऐसा माहौल था कि सरकारी टीमें और एंबुलेंस जाने से डरती थीं। आम आदिवासी परिवार बिना किसी जुर्म के स्कूल, सड़क और अस्पताल जैसी सुविधाओं से वंचित रहे। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में सुरक्षाबलों की जो आक्रामक रणनीति बनी, उसने इन इलाकों को लाल आतंक से मुक्त कर दिया है। 40 साल बाद अब यहां खौफ नहीं, बल्कि विकास की नई उम्मीद जगी है।
सीएम का दौरा और 200 करोड़ का बड़ा डेवलपमेंट फंड
सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता होने का ही नतीजा है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पहली बार इन बेहद संवेदनशील गांवों का बेखौफ दौरा किया। इस दौरे से स्थानीय लोगों का कानून व्यवस्था और प्रशासन पर भरोसा बहुत मजबूत हुआ है। सरकार ने भी कदम आगे बढ़ाते हुए पहले चरण में 100 से ज्यादा गांवों के लिए 200 करोड़ रुपये से अधिक का बड़ा बजट जारी कर दिया है। जिन खुफिया रास्तों पर कभी नक्सली कैंप लगते थे, वहां आज सरकारी जनसुविधा केंद्र और पक्की इमारतें सीना ताने खड़ी हैं।
बेखौफ होकर 980 घरों तक पहुंचीं मेडिकल टीमें
सुरक्षा की गारंटी मिलने के बाद अब स्वास्थ्य विभाग की 20 सर्वे टीमें, 4 मोबाइल मेडिकल यूनिट (MMU), 10 चिकित्सा अधिकारी और 4 एंबुलेंस बिना किसी डर के गांव-गांव गश्त कर रही हैं। इन टीमों ने सुरक्षित माहौल में 10 गांवों के करीब 980 घरों का दरवाजा खटखटाया है। पहले जहां लोग डर के मारे बीमारी तक नहीं बताते थे, वहीं अब खुलकर सामने आ रहे हैं। इस सर्वे में 630 मरीजों की पहचान हुई, जिनमें से 461 का घर पर ही इलाज हुआ और 125 को अस्पताल पहुंचाया गया।
बच्चों की सेहत सुरक्षित करने का चल रहा मिशन
कुपोषण और बीमारियों से बच्चों को सुरक्षित करने के लिए मेडिकल टीमें पूरे लाव-लश्कर के साथ जुटी हैं। सुरक्षा व्यवस्था के बीच 169 बीमार बच्चों को अस्पताल ले जाया गया, जिनमें से 125 स्वस्थ होकर लौट आए हैं। इसके अलावा 597 बच्चों को आयरन सिरप, 521 को अल्बेंडाजोल, 63 को मीजल्स का टीका और बाकी बच्चों को विटामिन-ए, डफर व जिंक की खुराक दी गई है। सबसे अहम काम हर नागरिक का मेडिकल रिकॉर्ड तैयार करना है, जो भविष्य में बहुत काम आएगा।
बंदूक की जगह अब किताबों और थर्मामीटर ने ली
अगर आज आप बालाघाट की तुलना भोपाल या इंदौर जैसे शांत शहरों से करेंगे, तो यह सही पैमाना नहीं होगा। आपको यह देखना होगा कि यह इलाका किस खौफनाक अतीत से बाहर निकला है। आज यहां सड़क का मतलब सिर्फ डामर नहीं, बल्कि पुलिस, प्रशासन और एंबुलेंस की तेज पहुंच है। 40 साल के लंबे खौफ के बाद आज जंगलों में गोलियों की आवाज की जगह स्कूल की घंटी और डॉक्टरों के स्टेथोस्कोप की आहट सुनाई दे रही है।


