कठोर दिखते थे, दिल कोमल था: RSS के वरिष्ठ प्रचारक विनोद कुमार की सभा में संघ पदाधिकारी
विनोद जी बाहर से कठोर दिखते थे, पर दिल कोमल था। गोरेलाल जी ने बताया कि संगठन के हित में वे कठोर फैसले लेने से पीछे नहीं हटते थे।

संघ कार्यकर्ताओं की श्रद्धांजलि सभा का दृश्य
RSS के वरिष्ठ प्रचारक विनोद कुमार की श्रद्धांजलि सभा शुक्रवार को हुई, जिसमें उनके संगठन-अनुशासन का खास जिक्र रहा। क्षेत्र घुमंतू कार्य प्रमुख गोरेलाल जी ने बताया कि महाकौशल में प्रांत प्रचारक रहते हुए विनोद जी संगठन-विरोधी गतिविधियों के मामलों में जरूरी कड़े फैसले लेने से पीछे नहीं हटते थे। साथ ही उनका हृदय बहुत कोमल था।
सभा में पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी, अशोक जी पांडे और संघ के अखिल भारतीय सह बौद्धिक प्रमुख दीपक विस्पुते भी मौजूद रहे। सभी ने विनोद कुमार के संस्मरण साझा किए।
संगठन के हित में दृढ़, कार्यकर्ताओं के लिए नरम
गोरेलाल जी के अनुसार प्रांत प्रचारक के रूप में विनोद जी कार्यकर्ताओं की भावनाओं के प्रति बेहद सजग रहते थे। किसी वरिष्ठ कार्यकर्ता की जिम्मेदारी बदलनी हो, तो वे उसकी सक्रियता और मन का ख्याल रखते थे। लेकिन संगठन के विरुद्ध गतिविधियों के मामलों में जरूरी कठोर निर्णय से वे कभी नहीं हिचके। उनका दिल मां की तरह कोमल था, फिर भी संगठन का हित सामने हो तो वे दृढ़ और अनुशासित रहते थे।
उन्होंने कहा कि विनोद जी में मां जैसी करुणा, पिता जैसी चिंता और गुरु जैसा मार्गदर्शन साथ दिखता था। आज के सामाजिक कार्यकर्ता उनके जीवन से सीख सकते हैं कि कितना बोलना है, क्या बोलना है और कैसा आचरण रखना है।
अनुशासन से भरी दिनचर्या, उज्जैन में भी वही नियम
गोरेलाल जी ने बताया कि मूल रूप से उत्तर प्रदेश से आने वाले विनोद जी ने संघ में कई दायित्व निभाए। दायित्वों से मुक्ति के बाद उज्जैन में रहते हुए भी उनकी दिनचर्या में कोई ढिलाई नहीं आई। नियमित कसरत, स्नान-ध्यान, जप-तप, बाबा महाकाल के दर्शन, आरती में सहभागिता और समाज के अलग-अलग वर्गों व कार्यकर्ताओं से सहज बातचीत उनके जीवन का अटूट हिस्सा रहे। बड़े पद छूटने के बाद भी उन्होंने व्यवहार नहीं बदला और मिलने वालों की संख्या के बदलाव को मन पर हावी नहीं होने दिया।
गोरेलाल जी ने गीता का श्लोक सुनाया, जिसमें सात्विक कर्ता की पहचान बताई गई है: “मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः। सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥” उनका कहना था कि लगाव और अहंकार से मुक्त, धैर्य और उत्साह से भरे और जीत-हार में एक जैसे रहने वाले गुण विनोद जी में सहज दिखाई देते थे।
55 साल का प्रचारक जीवन और कार्यकर्ताओं की परख
दीपक विस्पुते ने कहा कि विनोद जी ऊंचे पढ़े-लिखे थे और चाहते तो कामयाब कारोबारी जीवन चुन सकते थे, मगर उन्होंने सारी जिंदगी संघ के कार्य को दे दी। करीब 55 वर्ष के प्रचारक जीवन में वे प्रांत प्रचारक, क्षेत्र प्रचारक और केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य जैसे दायित्वों पर रहे। उनके काम में बारीकी, आग्रह के साथ काम कराने की क्षमता, इंसान की पहचान और कार्यकर्ताओं की फिक्र जैसे गुण साफ थे।
सादगी और आत्मप्रचार से दूरी
विस्पुते ने बताया कि विनोद जी के विरोधी भी उनकी सादगी और जीवन-मूल्यों के प्रशंसक थे। दिखावे और अपने प्रचार से उनकी दूरी सहज रूप से नजर आती थी। उन्होंने अपनी याद साझा करते हुए कहा कि जब वे प्रचारक का दायित्व छोड़कर घर जाने का सोच रहे थे, तब विनोद जी ने उनसे बात की और सही दिशा दी। उसका असर ऐसा हुआ कि वह ख्याल फिर नहीं आया। उनके अनुसार चित्र के सामने फूल रखना ही काफी नहीं, उनसे प्रेरणा लेकर उसे आचरण में उतारना ही असली श्रद्धांजलि होगी।
शिवराज बोले, समरसता के कामों में मिलती थी दिशा
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सामाजिक समरसता से जुड़े कई वैचारिक निर्णयों और योजनाओं में विनोद जी की दृष्टि और मार्गदर्शन महत्वपूर्ण रहता था। संत रविदास महाकुंभ, टंट्या मामा भील और भीमा नायक से जुड़े कार्यों और योजनाओं में उनकी अंतर्दृष्टि का विशेष योगदान रहा। विनोद जी इन विषयों की गहरी समझ रखते थे और उनके मार्गदर्शन से समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने की सोच मिलती थी।
शिवराज ने कहा कि विनोद जी बाहर से बहुत कठोर नजर आते थे, पर उनका हृदय बहुत कोमल था। उनके व्यवहार में अनुशासन और आत्मीयता साथ दिखती थी। उन्होंने और भी कुछ यादें साझा कीं और कहा कि उनके बताए रास्ते पर चलने की कोशिश करें, तो भारत माता को परम वैभव तक पहुंचाने के काम में हम अपना योगदान दे सकेंगे।
सोलंकी और पांडे की श्रद्धांजलि
पूर्व राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी ने कहा कि यह सभा केवल श्रद्धासुमन चढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसमें विनोद जी के जीवन को जानने, समझने और उनके आदर्शों के अनुसार जीने का संकल्प भी लेना है। प्रचारक का जीवन बाहर की नजर से भले अदृश्य रहे, पर वह अपने काम, व्यवहार और आत्मीय रिश्तों से असंख्य लोगों के हृदय में स्थायी जगह बना लेता है। सोलंकी ने कई संस्मरण सुनाए और अंतिम दिनों की याद करते हुए भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले अस्पताल में विनोद जी से बात करने की कोशिश की, पर उनकी हालत देखकर वे दुखी हो गए। वे बोल नहीं पा रहे थे और उन्हें ऑक्सीजन पाइप लगी थी। उन्होंने उनके प्रति अपना अपनापन और उनके जाने से पैदा हुई रिक्तता जाहिर की।
अशोक जी पांडे ने विनोद जी को कार्यकर्ता की चिंता, समाज के प्रति संवेदना, जीवन की प्रामाणिकता और दूरदृष्टि का प्रतिरूप बताया। उन्होंने कहा कि उनका जीवन अनुकरणीय है, क्योंकि किसी विचार या प्रतिज्ञा को शब्दों तक न रखकर जीवन में उतारना उनसे सीखा जा सकता है। उनका हर कार्य समाज और संगठन के प्रति समर्पण से प्रेरित था। पांडे ने हृदय की पूरी पवित्रता से श्रद्धासुमन अर्पित किए।
कुंभ, उद्योग जगत और आखिरी मुलाकात
गोरेलाल जी ने बताया कि प्रयागराज कुंभ में करीब एक महीने विनोद जी सक्रिय रहे। वहां आने वाले पुराने कार्यकर्ताओं, साधु-संतों और पूर्व प्रचारकों के आतिथ्य और उनकी सक्रियता बनाए रखने के लिए वे लगातार लगे रहे। उनकी चिंता थी कि कोई पुराना कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित या निष्क्रिय महसूस न करे।
उन्होंने यह भी कहा कि विनोद जी लोगों की क्षमता पहचानकर उन्हें समाज और संगठन के कार्य से जोड़ने में दक्ष थे। घुमंतू समाज के जो लोग आगे चलकर इंदौर में उद्योग स्थापित कर चुके थे, उन्हें उन्होंने आत्मीयता से संघकार्य से जोड़ा। दीपावली मिलन जैसे कार्यक्रमों से उद्योग जगत के लोगों को एकत्र करके उन्हें धीरे-धीरे संघ की विचारधारा से परिचित कराया।
मौन रखकर दी गई विदाई
श्रद्धांजलि सभा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संघ प्रेरित संगठनों के वरिष्ठ पदाधिकारी, कार्यकर्ता और विनोद जी से आत्मीय संबंध रखने वाले कई लोग शामिल हुए। सभा के बाद सभी उपस्थितजनों ने मौन रखकर विनोद जी को नमन किया और उनके चित्र पर पुष्प अर्पित किए।



